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राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम

राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम

छत्तीसगढ़ राज्य में कुष्ठ का प्रसार अन्य राज्यों की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक है । इस समस्या के निवारण के लिए ही राज्य में ‘राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम’ NLEP-National Leprosy Eradication Programme चलाया जा रहा है ।

भारत में कुष्ठ मामलों का एक बड़ा बोझ है और इसका अधिकांश कारण रोगियों की जागरूकता की कमी और निदान और उपचार के लिए पहुंच से संबंधित चुनौतियों से उपजा है। रोग का समय पर पता लगाना चुनौती है  क्योंकि देरी से पता लगाने से रोगियों में लंबे समय तक तंत्रिका क्षति हो सकती है।

कुष्ठ रोग को अक्सर सबसे कलंकित बीमारियों में से एक के रूप में सूचित किया गया है, हालांकि, अगर समय पर पता चल जाता है, तो अधिकांश मामलों को 6 से 12 महीनों के बीच ठीक किया जा सकता है।

हालही में राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम (NLEP) के आंकड़ों से पता चलता है कि बिहार, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और झारखंड ने नए कुष्ठ मामलों में 76 प्रतिशत का योगदान दिया है।

समान्यतः समाज में व्याप्त अवैज्ञानिक मान्यताओं व अंधविश्वासों के फलस्वरूप कुष्ठ रोग को छुपाया जाता है, जिससे इस रोग की सही स्थिति का आंकलन कठिन होता है। लोग इस रोग से पीड़ित होकर भयानक कष्ट पाते हुए भी इसके समुचित इलाज से वंचित रह जाते हैं । इस समस्या के निवारण के लिये ही ‘राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम छत्तीसगढ़ राज्य में चलाया जा रहा है ।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, देश में 2019-20 में कुष्ठ रोग के 114,451 नए मामलों का पता चला, जो दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के मामलों का 80 प्रतिशत था। 

कुष्ठ रोगियों की संख्या में बढ़ोतरी का कारण

  • वर्ष 2005 में भारत आधिकारिक तौर पर कुष्ठ रोग से मुक्त देश बन गया था, कुष्ठ रोग मुक्ति की घोषणा के साथ ही उन स्वास्थ्य कर्मियों के रोग उन्मूलन संबंधी प्रयास भी कम हो गए जो वर्ष 2005 तक ग्रामीण इलाकों में रोग की पहचान करने और उसके निवारण में सहायता कर रहे थे। कुष्ठ रोग की ओर अधिक ध्यान न दिये जाने के कारण इसके पीड़ितों में लगातार बढ़ोतरी होती गई।

कुष्ठ रोग उन्मूलन हेतु ‘राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम’

  • वर्ष 1955 में सरकार ने राष्ट्रीय कुष्ठ रोग नियंत्रण कार्यक्रम शुरू किया। वर्ष 1982 से मल्टी ड्रग थेरेपी की शुरुआत के बाद देश से कुष्ठ रोग के उन्मूलन के उद्देश्य से वर्ष 1983 में इसे राष्ट्रीय कुष्ठ रोग उन्मूलन कार्यक्रम (NLEP) के रूप में बदल दिया गया।
  • इस रोग के मामले की शीघ्र जानकारी और उपचार, कुष्ठ रोग उन्मूलन की कुंजी है, क्योंकि कुष्ठ रोगियों का जल्दी पता लगाने से संक्रमण के स्रोतों में कमी आएगी और रोग का संचारण भी रुकेगा। ‘आशा कार्यकर्त्री’, इस रोग के मामलों का पता लगाने में मदद कर रही हैं और सामुदायिक स्तर पर संपूर्ण उपचार भी सुनिश्चित कर रही हैं; इसके लिये उन्हें प्रोत्साहन राशि का भुगतान किया जाता है।
राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम

राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम

राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम का उद्देश्य :

समाज में छिपे सभी रोगियों की खोज कर उन्हें बहुऔषधि उपचार (MDT) नियमित एवं पूर्ण दिलाकर रोग पर नियंत्रण करना ताकि रोग का प्रसार रुक जाए व रोग की प्रभावी दर प्रति 10,000 जनसंख्या कम हो जाए ।

  • WHO के अनुसार, रोग समाप्ति का अर्थ उस स्थिति से है जब प्रसार दर 1 प्रति 10000 पर होती है।

2005 के उन्मूलन की घोषणा के बाद, अधिकांश कुष्ठ कार्यक्रमों को समाप्त कर दिया गया और संसाधनों को अधिक दबाव वाली स्वास्थ्य प्राथमिकताओं पर पुनर्निर्देशित किया गया।

राष्ट्रीय-कुष्ठ-उन्मूलन-कार्यक्रम स्वैच्छिक संस्था के माध्यम से कुष्ठ मुक्त व्यक्तियों की आवासीय व्यवस्था एवं पुनर्वास हेतु योजना संचालित की जा रही है।

महामारी ने केवल स्थिति को बढ़ा दिया है। संसाधनों का पुन: आवंटन किया गया था। और आज, हम देखते हैं कि देश में बहुत कम स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर कुष्ठ रोगियों की सर्जरी कर सकते हैं। कुष्ठ रोग के खिलाफ हमारी लड़ाई को फिर से शुरू करने की तत्काल आवश्यकता है।

जागरूकता :

विकृति को रोकने के लिए फिजियोथेरेपी इलाज करते हुए उन्हें आवश्यक सावधानियों और कसरतों के संबंध में बताया जाना चाहिए ।

कुष्ठ रोग माईक्रोबैक्टीरियम लैप्री नामक जीवाणु से होता है।

कुष्ठ रोग का प्रभाव और निवारण :

इस रोग के द्वारा चमड़ी और तंत्रिका तंत्र प्रभावित होता है। इसका इलाज कराये जाने पर यह रोग पूर्णतः ठीक हो जाता है। इसमें तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव के कारण हाथों और पैरों की उंगलियों पर विषम प्रभाव पड़ता है तथा आंशिक दिव्यांगता भी हो सकती है। फ़िजियोथेरेपी और नियमित कसरतों द्वारा इनप्रभावों को पूर्णतः ठीक किया जा सकता है। ऐसे मरीजों को डाक्टरी सलाह के साथ फ़िजियोथेरेपी अवश्य करानी चाहिए।

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